शुक्रवार, 24 मई 2024

IC Engine , IC engine Parts Name, IC Engine in Hindi

 अंतर्दहन इंजन परिचय (Introduction of IC Engine):

शब्द IC Engine का अर्थ है Internal Combustion Engine अर्थात् अंतर्दहन इंजन। अंतर्दहन इंजन वह इंजन है जिसमें ईंधन का दहन सिलेण्डर के अंदर होता है। "In Internal Combustion Engine fuel combustion takes place inside the engine cylinder."

उदाहरण के लिए-

(i) गैस इंजन जिसमें ईंधन के रूप में गैस का इस्तेमाल किया जाता है। 

(ii) पेट्रोल इंजन जिसमें ईंधन के रूप में हल्के द्रव जैसे पेट्रोल का इस्तेमाल किया जाता है।

(iii) डीजल इंजन जिसमें ईंधन के रूप में भारी द्रव जैसे डीजल का इस्तेमाल किया जाता है।

अंतर्दहन इंजन के प्रमुख गुण-

(i) इसकी सम्पूर्ण दक्षता (overall efficiency) उच्च होती है।

(ii) इसकी यंत्रावली (mechanism) सरल होती है।

(iii) इसमें निम्न भार एवं शक्ति अनुपात (low weight and power ratio) होता है।

(iv) इसका मूल्य अपेक्षाकृत कम होता है।

(v) यह आसानी से चालू हो जाता है।

(vi) यह compact होता है तथा कम स्थान घेरता है।



IC इंजन का विकास (Development of IC Engine):-

* अंतर्दहन इंजनों का प्रारम्भ 1629 1695 ई० में हुआ जब प्रसिद्ध डच भौतिक विज्ञानी ह्यूगन्स (Dutch physicist - Huygens) ने पहला गन पाउडर इंजन (Gun Powdered Engine) बनाया था।

* निकोलस कूगनाट (Nicholas Cugnot) ने 1770 में पहला Vehicle बनाया जो स्वयं उत्पादित शक्ति पर प्रचालित था। इसके पश्चात लिनयर (Lenoir) द्वारा 1860 में पहला कोल गैस (Coal gas) पर आधारित इंजन बनाया जिसे लिन्यर इंजन (Lenoir Engine) कहा गया।

* जर्मनी में 1866 में एक ऐसे इंजन का निर्माण हुआ जिसमें Piston and Crank Shaft में कोई Connection नहीं था। शक्ति का संचरण flywheel के माध्यम से Rack and Pinion arrangement द्वारा किया गया।

* इस इंजन का नाम OTTO LANGEN FREE PISTON ENGINE रखा गया।

* 1862-1866 में जर्मन इंजीनियर निकोलस अगस्त आटो (Nikolas August Otto) द्वारा पहला 4-stroke engine बनाया गया। यह इंजन 4-stroke engine के क्षेत्र का स्तम्भ साबित हुआ। आज यह इंजन 4-stroke Spark Ignition Engine के नाम से प्रसिद्ध है।

* 1892 में जर्मन इंजीनियर रूडोल्फ डीजल (Rudolf Diesel) द्वारा एक ऐसे इंजन का निर्माण किया जो airless injection system पर आधारित था। आज यह इंजन 4-Stroke Compression Ignition Engine के नाम से प्रसिद्ध है।


अन्य प्रमुख अंतर्दहन इंजन:

* अमेरिका द्वारा 1873 में एक ऐसा इंजन बनाया गया जो स्थिर दाब दहन तथा ईंधन का सम्पूर्ण प्रसारण वातावरणीय दाब तक (Constant pressure combustion and complete expansion up to atmospheric pressure) पर आधारित था जिसे BARY TON ENGINE नाम दिया गया।



* ब्रिटिश इंजीनियर द्वारा 1885 में एक ऐसा इंजन बनाया गया जो Single cylinder with shorten suction stroke पर आधारित था, इसे Atkinson Engine कहा गया।


अंतर्दहन इंजन के विभिन्न अंग, उनके कार्य तथा पदार्थ जिससे निर्मित हैं (Location and Function of Various Parts of IC Engine and Material Used for them) अंतर्दहन इंजन का व्यवस्थित आरेख निम्नलिखित है-




उष्मगतिकी का नियम

 ऊष्मागतिकी : परिचय एवं सिद्धान्त


ऊष्मागतिकी को निम्न प्रकार से परिभाषित किया गया है-

"विज्ञान की वह शाखा जिसके अंतर्गत ऊर्जा तथा उसके रूपान्तरण का अध्ययन किया जाता है, ऊष्मागतिकी कहलाता है |

अगर इसका दूसरा परिभाषा देखें तो…

ऊष्मागतिकी के अंतर्गत हम ऊष्मा तथा कार्य के बीच के सम्बन्ध का अध्ययन भौतिक निकायों के साथ करते हैं। 

ऊष्मागतिकी के अंतर्गत हम सामान्यतः गैसों तथा वाष्पों की ऊर्जा का अध्ययन करते हैं। इसमें हम ऊर्जा का रूपान्तरण, ऊर्जा द्वारा निकायों पर किए गए कार्य, निकायों के गुण तथा अन्य तथ्यों का वर्णन करेगें।

ऊष्मागतिकी सामान्यतः चार नियमों पर आधारित है। जो निम्नलिखित हैं-


ऊष्मागतिकी का शून्यवाँ नियम:   तापीय साम्यता पर आधारित है तथा तापमान के बीच संबंध स्थापित करता है|


ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम :   यह आंतरिक ऊर्जा पर आधारित है।


ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम: यह सम्पूर्ण ऊष्मा के कार्य में परिवर्तन की प्रतिबद्धता को दर्शाता है तथा बढ़ते एण्ट्रापी के सिद्धान्त पर आधारित है।


ऊष्मागतिकी का तृतीय नियम : यह निरपेक्ष शून्य एण्ट्रापी पर आधारित है। इस नियम के अनुसार, "किसी पदार्थ का परम शून्य तापक्रम" पर एन्ट्रापी शून्य होती है। यह नियम संभव नही होता है।



यह चारों नियम प्रयोगात्मक परीक्षणों पर आधारित हैं, इनका कोई गणितीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। यह चारों नियम तर्कपूर्ण होते हैं।



ऊष्मागतिकी ग्रीक शब्द से लिया गया है। ऊष्मागतिकी का प्रथम सैद्धान्तिक उपयोग 1650 ई० में आटो वेन गुर्के (Otto Von Guericke) द्वारा किया था जब उन्होंने दुनिया का पहला निर्वात पम्प स्थापित किया था।



ऊष्मागतिकी के जनक के रूप में साडी कारनॉट (Sadi Carnot) को माना जाता है जिनकी 1824 में ऊष्मागतिकी पर प्रकाशित पुस्तक, ऊष्मागतिकी के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हुई। इस क्षेत्र में कुछ अन्य नाम प्रमुख हैं, जिनका योगदान उल्लेखनीय है-  
 विलियम रैकिंन, रूडोल्फ क्लासियस, विलियम थामसन, जेम्स डार्क, मैक्सवेल, बोल्टजमैन, फ्लैंकस, विलियर्ड गिब्स आदि।





ऊष्मागतिकी का वर्गीकरण :    

अध्ययन की दृष्टि से ऊष्मागतिकी को दो वर्गों में वगीकृत किया गया है-

(i) क्लासिकल ऊष्मागतिकी (Classical thermodynamics)

(ii) सांख्यिकीय ऊष्मागतिकी (Statistical thermodynamics)



(i) क्लासिकल ऊष्मागतिकी:  इस ऊष्मागतिकी में निकाय के द्रव्य के गुणों में परिवर्तन का अध्ययन मैक्रोस्कोपिक दृष्टि से करते हैं। मैक्रोस्क्रोपिक दृष्टि से तात्पर्य निकाय के सम्पूर्ण द्रव्यमान को एक मानते हुए उस पर परिवर्तनों का अध्ययन करना होता है। मैक्रोस्कोपिक का शाब्दिक अर्थ है बड़ा या कुल। कुछ प्रमुख मैक्रोस्कोपिक गुण निम्नलिखित हैं-

तापमान, आंतरिक ऊर्जा, दाब, एण्ट्रापी आदि।





(ii) सांख्यिकीय ऊष्मागतिकी इस ऊष्मागतिकी में निकाय के द्रव्य के गुणो में परिवर्तन का अध्ययन माइक्रोस्कोपिक दृष्टि से करते हैं। माइक्रोस्कोपिक दृष्टि से तात्पर्य द्रव्य के प्रत्येक अणु एवं परमाणुओं के गुणो में होने वाले परिवर्तन का अध्ययन किया जाए। माइक्रोस्कोपिक का शाब्दिक अर्थ है छोटा। कुछ प्रमुख माइक्रोस्कोपिक गुण हैं, वेग, संवेग, गतिज ऊर्जा आदि।








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सोमवार, 20 मई 2024

VERNIER Calipers ( वर्नियर कैलिपर ) in Hindi

VERNIER Calipers ( वर्नियर कैलिपर ): 


वर्नियर कैलिपर्स की अल्पतमांक (Least-Count) से आप क्या समझते हैं? इसकी संरचना का चित्र सहित वर्णन कीजिए।

वर्नियर कैलिपर्स का आविष्कार फ्रांस के एक वैज्ञानिक पैरी वर्नियर ने किया था। उसी के नाम पर इस कैलिपर्स का नाम वर्नियर कैलीपर्स पड़ा। वर्नियर कैलिपर्स बाजार में विभिन्न परिशुद्धताओं (Accuracy) में उपलब्ध हैं। जैसे- 0.1 मिमी, 0.05 मिमी तथा 0.02 मिमी, मीटरी प्रणाली में तथा 0.001 ब्रिटिश प्रणाली में। वर्नियर कैलिपर्स के द्वारा बाहरी, आन्तरिक तथा गहराई तीनों प्रकार की

मापें ले सकते हैं। ये 6", 7", 1' तथा 2' तक की लम्बाइयों में बाजार में उपलब्ध हैं। 5.1-1 वर्नियर कैलिपर्स की संरचना-चित्र 5.1 में एक साधारण वर्नियर कैलिपर दर्शाया गया है। यह साधारणतः निकिल क्रोमियम स्टील या वेनेडियम स्टील के बने होते हैं।







 वर्नियर कैलिपर्स की संरचना  

चित्र में एक साधारण वर्नियर कैलिपर दर्शाया गया है। यह साधारणतः निकिल क्रोमियम स्टील या वेनेडियम स्टील के बने होते हैं। इनके मुख्य भाग निम्नलिखित हैं...


1. मेन स्केल (Main Scalé),

2. वर्नियर स्केल (Vernier Scale),

3. फाइन एड्‌जस्टमैन्ट यूनिट (Fine Adjustment Unit)

4. डेप्य मैजरिंग स्ट्रिप (Depth Measuring Strip)






1. मेन स्केल  (Main Scale) -    यह एक वेनेडियम स्टील की स्टील रूल के समान चौड़ी परन्तु उससे काफी मोटी प‌ट्टी होती है, जिस पर एक साइड में मिमी तथा दूसरी साइड में इंचों के निशान अंकित होते हैं। मिमी० तथा इंचों के दसवें भागों को भी आगे कई भागों में बाँटा गया होता है। जैसा कि  image में दर्शाया गया है। इसके अगले भाग में एक फिक्स्ड जबड़ा तथा आन्तरिक माप के लिए फिक्स्ड निब (Fixed Nib) लगी होती है। मेन स्केल के पीछे की साइड में एक यूव (Groove) होता है जिसमें डैप्य मैजरिंग स्ट्रिप (Depth Measuring Strip) स्लाइड (Slide) करती है। गर्नियर कैलिपर के बाकी सभी भाग मेन स्केल के ऊपर ही स्लाइड करने के लिए फिट (fit) किये गये होते हैं।













2. वर्नियर स्केल (Vernier Scale):- यह वर्नियर कैलिपर्स का मुख्य भाग होता है। इसको मेन स्केल पर स्लाइड करने के लिए बनाया गया है। इसकी दोनों साइडों में कमानी स्प्रिंग दिया होता है जो इसको सदा एक ही पोजीशन में रखता है। इसके बीच में एक खिड़की (window) कटी होती है जिस पर मेन स्केल के निश्चित भागों को एक से अधिक भागों में बाँटा गया होता है। इसको वर्नियर के सिद्धान्त में स्पष्ट किया गया है। वर्नियर स्केल के साथ में मेन स्केल के समान ही चल जबड़ा (Movable Jaw) तथा चल निब (Movable Nib) लगी होती है। इसको किसी स्थान पर स्थिर करने के लिए इसके ऊपरी भाग में एक लॉकिंग स्कू लगा होता है। यह स्केल एक फाइन एड्जस्टमेन्ट यूनिट से मिला होता है।












3. फाइन एड्जस्टमेन्ट यूनिट (Fine Adjustment Unit):-  वर्नियर स्केल को थोड़ा सा आगे-पीछे लेने के लिए इस यूनिट का प्रयोग किया जाता है। इस यूनिट के ऊपर लगे लॉकिंग स्कू से इसे स्थिर कर दिया जाता है। अब इसके नीचे लगे नट को घुमाने पर उसमें लगे ख्कू के द्वारा वर्नियर स्केल आगे-पीछे सरकता है। इसका प्रयोग वर्नियर स्केल के फाइन एड्जस्टमेन्ट के लिए किया जाता है।






4.डेप्थ मैजरिंग स्ट्रिप (Depth Measuring Strip) - वर्नियर स्केल के साथ में एक बारीक स्ट्रिप लगी होती है जो मेन स्केल में पीछे की ओर बने ग्रूव(Groove) में स्लाइड करती है। यह ग्रूव से बाहर न आये इसके लिए मेन स्केल के आखिरी सिरे पर ग्रूव के ऊपर एक पत्ती लगी होती है।



जब वर्नियर स्केल के जबड़े मिले होते हैं तो मेन स्केल पर शून्य वर्नियर स्केल के शून्य के सामने होता है। ऐसे समय पर डैप्य स्ट्रिप भी मेन स्केल के आखिरी सिरे से मिल रही होती है। कुछ कैलिपर में आन्तरिक माप लेने के लिए अलग से जबड़े नहीं होते बल्कि बाहरी माप लेने वाले जबड़ों को एक निश्चित मोटाई में बाहर से गोल किया होता है। यह मोटाई साधारणतः 10 मिमी होती है। इस माप को कैलिपर द्वारा ली गई आन्तरिक माप में जोड़ दिया जाता है।



वर्नियर का सिद्धान्त (Principle of Vernier) -

चित्र  में वर्नियर का सिद्धान्त समझाया गया है। वर्नियर को समझने के लिए उसकी अल्पतम माप का पता होना आवश्यक है, अतः

अल्पतम माप (Least Count) – किसी वर्नियर कैलिपर्स द्वारा मापी जा सकने वाली छोटी से छोटी माप उसकी अल्पतम या अल्पतमांक (Least Count) कहलाती है। यह अल्पतम माप (Least Count) वर्नियर कैलिपर्स के मुख्य स्केल पर बने एक खाने का मान (Value of One Division) तथा वर्नियर स्केल पर बने एक खाने के मान के अन्तर के बराबर होता है।


चित्र में दर्शाये गये मेन स्केल के एक भाग का मान 1.0 मिमी० है तथा वर्नियर स्केल के एक भाग का मान 0.90 मिमी० है। इस प्रकार दोनों का अन्तर 0.10 मिमी इस वर्नियर स्केल की अल्पतम माप होगी |           



अल्पतम माप को हम निम्न साधारण फॉरमूले के द्वारा भी निकाल सकते हैं-

अल्पतमांक या अल्पतम माप =                                  मुख्य स्केल के एक भाग का मान       
                                                                          वर्नियर स्केल के कुल निशानों की संख्या 




यहाँ पर अल्पतम माप  = 1/10
                                           = 0.1 मिमी०





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Top Neuclear power plant in india Hindi

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